Monday, April 14, 2008

सिमी हो या विमी, क्‍या फर्क पड़ता है

आज सुबह की ही बात है। मिर्जा मेरे घर पर आए। बगल में अखबार और मुंह में पान की सुर्ख लाली। पजामे की हालत देखकर लग रहा था, जैसे बिस्‍तर छोड़कर सीधे पनवाड़ी दुकान से मेरे घर तशरीफ ले आए हों। फिर भी मैंने पूछ ही लिया- क्‍यों मिर्जा साहब, आज सुबह-सुबह? कोई खास बात है क्‍या? मिर्जा ने पान की पीक मेरे फ्लैट की सीड़ियों पर ही थूकते हुए कहा, 'अमां मियां, खुद को पत्रकार कहते हो और इतना भी पता नहीं कि आज क्‍या गड़बड़ हो गई है?'
मैंने पूछा, ऐसी क्‍या बात है, जो हमें पता नहीं ? कोई अनहोनी तो नहीं हुई ? मिर्जा बोले, मियां मरे हमारे दुश्‍मन, हम इतनी जल्‍दी थोड़े ही खिसकने वाले हैं। हुआ यूं कि तुम्‍हारी भाभी कल शाम को बाजार गई थीं और वहां से साबुन की टिकिया थोक के भाव उठा लाईं।
मैंने कहा, इसमे परेशानी की क्‍या बात है। गर्मी का मौसम है, खूब नहाओ। मिर्जा उबल पड़े, कहने लगे, क्‍या खूब मजाक करते हो मियां ? अखबार में छपा है कि सिमी ने नया संगठन विमी बना लिया है।
मैंने हंसते हुए कहा, 'तो क्‍या हुआ, नाम से कोई फर्क पड़ता है भला ?' नाम बदल जाए, पर काम तो वही रहेगा।
अब मिर्जा अपने रंग में आए और बोले, 'इत्‍ती देर से वही तो समझा रिया हूं मियां। तुम्‍हारी भाई जो साबुन लेकर आई हैं, उसका नाम भी विमी बार है।' मैंने कहा, चलो अच्‍छा है, इसी बहाने ब्रांडिंग भी हो गई। तो इसमें घबराने वाली क्‍या बात है ?
चाय का प्‍याला हाथ में लेकर कुल्‍ला करने के अंदाज में मिर्जा बोले, कल को अगर घर पर रेड पड़ गई तो ? में तो खामखां मारा जाऊंगा। मैंने समझाया, देखिए मिर्जा साहब, दुनिया में न जाने कितनी विमी होंगी, उसी के नाम पर साबुन का नाम रख लिया होगा। वैसे भी कल को तो 'उन्‍हें' भी राजनीति की मुख्‍य धारा में आना ही है, जैसे जम्‍मू-कश्‍मीर के आतंकी संगठनों ने आजकल एक पार्टी बना ली है।
यह सुनते ही मिर्जा सोफे पर उछलकर बैठ गए, बोले - क्‍या बात करते हो मियां ? मैंने कहा, हां। अब नेपाल को ही देख लो, कल तक जंगल में रहने वाले माओवादी आज सत्‍ता के दावेदार हैं। चुनाव जीत गए हैं।
मैंने कहा, राजनीति है ही ऐसी चीज कि जिसने इसका लड्डू एक बार गटक लिया, उसकी तो पौ बारह। मिर्जा सुनते रहे, बिस्‍कुट की प्‍लेट खाली होती रही और वक्‍त गुजरता रहा। मैंने उन्‍हें समझाइश दी कि घर जाकर पहले तो नए विमी साबुन से अच्‍छी तरह नहाएं-धोएं, प्रोडक्‍ट को परखें और फिर बताएं कि उन्‍हें कैसा महसूस हुआ। अगर प्रोडक्‍ट सचमुच 'काफी बड़ा' हुआ तो आगे वापरें, वरना भूल जाएं। मैंने उन्‍हें यह भी कहा कि आने वाले समय के ब्रांड एंबेसेडर यही लोग होंगे। हो सकता है कि कल आप 'प्रचंड' डिटर्जेंट केक देखें, या नागौरी नमकीन। असल बात नाम की चर्चा से है। नाम चर्चित हो तो ब्रांड बनने में देर नहीं लगती। बाजार ही ऐसा है, जो दिखता है वही बिकता है। रामदास सैफ को भले ही चिप्‍स के विज्ञापन के लिए कोस लें, नाम में वजन के हिसाब से वे पीछे ही रहेंगे।
मिर्जा की बिस्‍कुट खत्‍म हो गई थी और चाय भी। बोले, 'खामखां मेरा औप अपना वक्‍त बरबाद किया। शाम को ही बता देते तो तुम्‍हारी भाभी को इतनी डांट न खानी पड़ती। खैर में तो चल रिया हूं, पर ध्‍यान रखना......... आगे से ऐसी जरूरी बातें हमें बताते रहना, नई तो चाय-बिस्‍कुट का खर्चा महंगा पड़ जाएगा।'